बुधवार, 16 सितंबर 2020

"विश्व गुरु बनने की हर तैयारी है"




भूख, गरीबी, चोरी है, बीमारी है

विश्व गुरु बनने की हर तैयारी है


रोजगार के ओछे मुद्दे मत छेंड़ो

विकसित होने की जड़ ही बेकारी है


भूंख लगी है? सबको बोलो सब्र करें

जल्दी वादा बंटने की तैयारी है


लालकिला, स्टेशन, अड्डे बेंच दिए

खाली नेता बचा यहां सरकारी है


रामराज्य तो एक दिन में ले आएंगे

पहले रावण लाने की तैयारी है


जो भी सत्ता में आता है खाता है

इसमे क्या? इस बार तुम्हारी बारी है


कुछ भक्तों का अक्सर ऐसा लगता है 

मुझको उल्टा दिखने की बीमारी है


अनुराग सिंह "ऋषी"


चित्र: गूगल से साभार 

बुधवार, 30 अक्तूबर 2019

नज़्म- ज़िन्दगी



ज़िन्दगी अब वो ज़िन्दगी न रही...
अब तो लम्हों को काटा जाता है...
जैसे करता है नौकरी कोई...
बेसबब रोज ही खामोशी से...
फ़र्ज़ की बेड़ियों में जकड़े हुए...
सांस दर सांस कैदियों की तरह...
और फिर दिन... महीने... साल कई...
वक़्त के साथ बीत जाते हैं...
और आगे का कुछ ख्याल नही...
मौत की राह ताकी जाती है...
ज़िन्दगी अब वो ज़िन्दगी न रही...

अनुराग सिंह "ऋषि"

चित्र- गूगल से साभार

मंगलवार, 29 अक्तूबर 2019

"ठहर गया हूँ मैं"



ज़िन्दगी क्यों ठहर गया हूं मैं
मुझको लगता है मर गया हूँ मैं

कोई हसरत नही रही बाकी 
सच कहो क्या गुज़र गया हूँ मैं

ज़र्द चेहरे को देख कर मेरे
लोग समझे निखर गया हूँ मैं

सेहरा-ए-दर्द था मज़ाक नही 
कैसे भी पार कर गया हूं मैं

मैं भी खुदरंग वक़्त था साहब
हाँ मगर अब गुज़र गया हूँ मैं

हां तेरी रुखसती के बाद सही 
जैसे तैसे सुधर गया हूं मैं

अनुराग सिंह "ऋषि"

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

"भय"




दिन भर की अथक मेहनत से
थक कर लाल हो चूका
दक्षिण पश्चिम का आसमान...
करता है आश्वस्त
की लो बीत गया आज का दिन भी सुरक्षित...
पर खतरा अभी टला नही आज की तारीख का
सोचता है राह का पथिक
क्यों की रात्रि के खाते में ही होते हैं दर्ज
कई अप्रत्याशित अमूर्त क्षण
नगरों की परिपाटी में...
अमूर्त क्षण...जिनके मूर्त होने का भय
सबसे मुख्य अवयव है
आदमी को इंसान बनाये रखने का
...ऋषी

सोमवार, 13 नवंबर 2017

विदा




आखिरी वक़्त आ गया साथी
हमको होना है अब जुदा साथी

अब से अपना ख्याल रख लेना
और बोलूं भी मैं तो क्या साथी

मैं तुम्हारी ख़ुशी तराशुंगा
तुम भी करना कहीं दुवा साथी

अब नई जिंदगी सहेजो तुम
साथ इतना ही था लिखा साथी

कुछ भी तो तुमको दे नही पाया
तुमने सब कुछ मुझे दिया साथी

मैं भी खुद को कहीं खपाउंगा
तुम भी देना मुझे भुला साथी

रुखसती मौत सी मुअय्यन है
आज लेता हूँ मैं विदा साथी

ऋषी
12/11/2017
चित्र- गूगल से साभार

रविवार, 4 सितंबर 2016

"प्रेम"


सबसे पहले बनाया गया होगा प्रेम
ताकि बाँधे जा सकें दो मन बन्धन में
बिना किसी बन्धन के ...
तब बनाये गये होंगे भौतिक उपांग
देने को इक धरातल 
की रोपा जा सके पौधा प्रेम का...
तब बनाया होगा बिछोह
ताकि दर्ज हो सके प्रेम 
अपनी तीव्रता के साथ...
फिर जरुरत पड़ी होगी दर्द की 
ताकि मिल सके अस्तित्व 
प्रेम को प्रेम का ...
क्या ऐसी ही होगी उत्पत्ति प्रेम की 
कल्पना करता है 
प्रेम का आदिकवि......... अनुराग सिंह "ऋषी"

05/09/2016
(चित्र गूगल से साभार)

सोमवार, 1 अगस्त 2016

"ये दिल अब आशियाना चाहता है"


मुसलसल इक ठिकाना चाहता है
ये दिल अब आशियाना चाहता है

किसी के प्यार पर इतना भरोसा?
वो शायद टूट जाना चाहता है

मुझे डर है की मैं न डूब जाऊं
समन्दर पास आना चाहता है

ज़माने भर के बैठाये हैं पहरे
परिंदा एक दाना चाहता है

हज़ारों महफिलें लूटीं हैं हमने
वो मेरा दिल चुराना चाहता है

मैं लावारिस हूँ ये ऐलान कर दो
वो मुझपे हक़ जमाना चाहता है

अनुराग सिंह "ॠषी"