दिन भर की अथक मेहनत से
थक कर लाल हो चूका
दक्षिण पश्चिम का आसमान...
करता है आश्वस्त
की लो बीत गया आज का दिन भी सुरक्षित...
पर खतरा अभी टला नही आज की तारीख का
सोचता है राह का पथिक
क्यों की रात्रि के खाते में ही होते हैं दर्ज
कई अप्रत्याशित अमूर्त क्षण
नगरों की परिपाटी में...
अमूर्त क्षण...जिनके मूर्त होने का भय
सबसे मुख्य अवयव है
आदमी को इंसान बनाये रखने का
...ऋषी

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