शनिवार, 27 अप्रैल 2013

"बिखरे अश्क"



अपने हयात गम में डुबोता रहा हूँ मैं,
खुद को ही नस्तरों से चुभोता रहा हूँ मैं,

तेरी हैं ये अमानतें जिनको सम्हाल कर,
हर ज़ख्म एक साथ पिरोता रहा हूँ मैं,

कोई गिला नही है इन आँखों में अब तेरा,
अश्कों से अपनी आँख यों धोता रहा हूँ मैं,

ज़श्न-ऐ-ज़हाँ के शोर में कुचली सी सिसकियाँ,
महफ़िल से फकत दूर ही रोता रहा हूँ मैं,

कुछ तेरी आबरू थी कुछ मेरी आरज़ू,
ख़ामोश जो बदनाम यूँ होता रहा हूँ मैं,

फ़ुरकत में बहलने को "ऋषी" काम आएंगी,
ये सोंच तेरी यादें संजोता रहा हूँ मैं.

अनुराग सिंह  "ऋषी"
28/04/2013

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