रविवार, 4 सितंबर 2016

"प्रेम"


सबसे पहले बनाया गया होगा प्रेम
ताकि बाँधे जा सकें दो मन बन्धन में
बिना किसी बन्धन के ...
तब बनाये गये होंगे भौतिक उपांग
देने को इक धरातल 
की रोपा जा सके पौधा प्रेम का...
तब बनाया होगा बिछोह
ताकि दर्ज हो सके प्रेम 
अपनी तीव्रता के साथ...
फिर जरुरत पड़ी होगी दर्द की 
ताकि मिल सके अस्तित्व 
प्रेम को प्रेम का ...
क्या ऐसी ही होगी उत्पत्ति प्रेम की 
कल्पना करता है 
प्रेम का आदिकवि......... अनुराग सिंह "ऋषी"

05/09/2016
(चित्र गूगल से साभार)

सोमवार, 1 अगस्त 2016

"ये दिल अब आशियाना चाहता है"


मुसलसल इक ठिकाना चाहता है
ये दिल अब आशियाना चाहता है

किसी के प्यार पर इतना भरोसा?
वो शायद टूट जाना चाहता है

मुझे डर है की मैं न डूब जाऊं
समन्दर पास आना चाहता है

ज़माने भर के बैठाये हैं पहरे
परिंदा एक दाना चाहता है

हज़ारों महफिलें लूटीं हैं हमने
वो मेरा दिल चुराना चाहता है

मैं लावारिस हूँ ये ऐलान कर दो
वो मुझपे हक़ जमाना चाहता है

अनुराग सिंह "ॠषी"

गुरुवार, 24 मार्च 2016

"दुवा करता"






दूर करता न तो मै क्या करता ?
तुझको रुस्वाइयां अता करता ?


दूर जाने में थी तेरी खुशियाँ
काश तू खुद से फैसला करता 


मुझमे भी एक रूह है साहब
कब तलक खुद को अनसुना करता 


अब तलक मैं सफ़र में ही होता
दूसरों का जो आसरा करता 


छोड़ दे ज़िंदगी मेरा पीछा
मेरी खातिर कोई दुवा करता 

अनुराग सिंह “ऋषी”


शनिवार, 12 मार्च 2016

"तल्ख़ है लहज़ा"



हमारी बेबसी को ज़िदगी का नाम न दो
फकीर हूँ जरूर मुफलिसी का नाम न दो
 
मैं खो गया था किसी रोज ज़ेहन में खुद के
मेरी तलाश करो गुमशुदी का नाम न दो
 
इबादतों की तरह है ये आशिकी माना
किसी के प्यार को पर बंदगी का नाम न दो
 
अमानतें हैं किसी की ये शाइरी मेरी
मेरे कलाम को तुम हर किसी का नाम न दो
 
मैं ज़िदगी से लड़ा हूँ तो तल्ख है लहज़ा
मेरे मिज़ाज को यूं बेरुखी का नाम न दो
 
कि एक रोज़ सभी जानवर लगे कहने
ये रहम हो की हमे आदमी का नाम न दो
 
अनुराग सिंह "ॠषी"

गुरुवार, 7 जनवरी 2016

"खुश होना तुम"



भारती के वीर सपूतों
हमें क्षमा करना तुम,
हमें क्षमा करना ...
की नही कर पाए हम तुम्हारे प्राणों की रक्षा
जैसे करते हो तुम हमारे प्राणों की,
हमें क्षमा करना की हम भूल गये तुम्हे देना तुम्हारी स्वेक्षा
ताकि प्रयोग कर सको तुम अपने हथियार समय रहते,
हमें क्षमा करना की हम करेंगे फिर से लल्लो चप्पो तुम्हारी समिधाओं पर
ताकि बचा रहे हमारा मतास्तित्व,
तुम खुश होना की हम बांटेंगे अपना यशगान तुम्हारे नाम से
दूरदर्शन पर,हर समाचार पत्रों में,
तुम खुश होना की माँ को मिल जायेगा किराया उसकी कोख का
नौ माह तक की गणना करके,
तुम खुश होना की पिता को शायद मिल जाए कोई पदक तुम्हारे बदले
जिसकी लम्बाई हो लाठी के बराबर,
तुम खुश होना की लो हो गया सारा हिसाब ...
तुम्हारे प्राणों का ... तुम्हारे बलिदान का
माँ की कोख का .... पिता की लाठी का...
और तुम्हारा भी ...
तुम खुश होना
बहुत खुश होना ................

अनुराग सिंह "ऋषी"
08/01/2015
(चित्र - गूगल से साभार)

शनिवार, 31 अक्तूबर 2015

"मेरी ग़ज़लों को जब पढ़ा जाय"




मेरी गज़लों को जब पढ़ा जाए
नाम उनका भी ले लिया जाये

ग़ज़लें उनकी हों शेर मेरे हों
बांटना इस तरह किया जाए

यूँ तो मशहूर हो नही पाया
मुझको बदनाम कर दिया जाए

मै ज़माने में ढल नही पाया
मुझको इंसानियत न खा जाए

बारहा यूँ न देखिये हमको
जान भी कितनी मर्तबा जाए

आज उनको भी इश्क सूझा है
कोई सदमा है, क्या कहा जाये

वक्त मेरा खराब आया है
जिसको जाना है वो चला जाए

रश्म-ए-आखिर में मर्सियाँ न हों
नाम उनका “ऋषी” लिया जाए 

अनुराग सिंह "ऋषी"
27/10/2015

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2015

"मेरी पहचान ही आवारगी है"





मुहब्बत सी मुझे होने लगी है
अज़ब मुश्किल मेरे पीछे पड़ी है

मै खुद को रोक लूँ या डूब जाऊं
मेरे मौला बता दे क्या सही है

मै दिल के दर्द जब भी बांटता हूँ
ज़माना सोंचता है शाइरी है

किसी को चाह कर फिर भूल जाना
पड़े लानत, ये कोई ज़िन्दगी है

कभी जो दर्द भी अच्छा लगे तो
सम्हाल जाओ यही तो आशिकी है

जकड़ पाएगी क्या ये ज़िन्दगी भी
मेरी पहचान ही आवारगी है

"ऋषी" जिंदा रहे तो फिर मिलेंगे
अभी फिलहाल मेरी रुखसती है 
अनुराग सिंह “ऋषी”
15/10/2015